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Sunday, 27 May 2012

एक जून को लॉन्च होगा न्यूज चैनस ‘समाचार प्लस’



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‘बेस्ट न्यूज़ नेटवर्क कंपनी लिमिटेड’ का समाचार प्लस 1 जून को लॉन्च होगा। फिलहाल  चैनल अभई ड्राई रन पर चल रहा है. समाचार प्लस’. मदर कंपनी कंपनी "बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के बैनर तले लॉन्च किया जा रहा है। इसके तहत 6 रीज़नल चैनल शुरू किए जाएंगे. पहला चैनल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के दर्शकों के लिए होगा. इसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, फिर बिहार-झारखंड के लिए अलग-अलग चैनल्स प्रसारित होंगे। सेकेन्ड फेज़ में पंजाब-हिमाचल-हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के दर्शकों के लिए क्षेत्रीय चैनल की शुरुआत की जाएगी.
 
बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के डायरेक्टर हैं उमेश कुमार, जो न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया (NNI) के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं.  'समाचार प्लस' में उमेश एडिटर-इन-चीफ और सीईओ दोनों ही भूमिकाएं निभाएंगे। टोटल टीवी के हेड रह चुके वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री मैनेजिंग एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं
 
।बतौर उमेश त्रिवेदी न्यूज़ चैनल पर आम दर्शक अपनी समस्या का समाधान पा सके, ऐसा कॉन्सेप्ट तैयार किया जा रहा है। दर्शकों को हर ख़बर सबसे पहले पूरी विश्वनीयता के साथ देने की चैनल की योजना है।
Sabhar-समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो

हिन्दी ब्लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा है: हिन्दी ब्लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा है: अविनाश वाचस्पति



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समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो
हिन्‍दी का प्रयोग न करने को देश में क्राइम घोषित कर दिया जाना चाहिए और आज मैं इस मंच से पूरा एक दशक हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के नाम करने की घोषणा करता हूं। इस एक दशक में आप देखेंगे कि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा बन गई है। जिस प्रकार मोबाइल फोन सभी तकनीक से युक्‍त हो गया है, उसी प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सभी प्रकार के संचार का वाहक बन जाएगी।
 
प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार और चर्चित ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर, अविनाश वाचस्‍पति ने जब यह आह्वान किया तो पूरा सभागार तालियों की करतल ध्‍वनि से गूंज उठा। उन्‍होंने कहा कि मीडियाकर्मियों और हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का समन्‍वयन अवश्‍य ही इस क्षेत्र में सकारात्‍मक क्रांति का वाहक बनेगा। जिस प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगर और मीडियाकर्मी एक साथ मिले हैं, उसी प्रकार यह परचम सभी क्षेत्रों में लहराना चाहिये। प्रत्‍येक क्षेत्र में से हिन्‍दी ब्‍लॉगर बनें और अपने अपने क्षेत्र की उपलब्धियों को सामने लायें। हिंदी मन की भाषा है और इस भाषा की जो शक्ति है वो हिन्‍दी के राष्‍ट्रभाषा न बनने से भी कम होने वाली नहीं है। वे राजधानी के आदर्श नगर में आयोजित हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की कार्यशाला और ब्‍लॉगर सम्‍मेलन के मौके पर उपस्थित समुदाय को संबोधित कर रहे थे।
 
आईबीएन7 के अनिल अत्री ने कहा कि हिंदी भाषा सम्पूर्ण राष्ट्र को जोड़ने की क्षमता रखती है। विश्व मंच पर राष्ट्र का गौरव भाषा बन सकती है। हिंदी खुद में एक संस्‍कृति और संस्कार है। दिल से बोली जाने और दिल से सुनी जाने वाली इस भाषा को पढ़ने और लिखने वालों की संख्या देशभर में कम नहीं है।
 
इस कार्यशाला की उपलब्धि उत्‍तराखंड खटीमा से पधारे डॉ. रूपचन्‍द्र शास्‍त्री ‘मयंक’ और चित्‍तौड़गढ़ से पधारी इंदुपुरी गोस्‍वामी रहीं। दिल्ली में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से भी भारी संख्या में पत्रकारों ने शिरकत कर वेब पत्रकारिता के गुर भी सीखे और यह अनुभव किया कि आज हिंदी किस मुकाम पर है और इसे शिखर पर पहुंचाया जा सकता है। इस कार्य शाला में शिरकत कर रहे मीडियाकर्मियों ने अपने-अपने ब्‍लॉग बनाये और संकल्प किया कि वे भी अब नियमित रूप से ब्लॉग लिखा करेंगे।
 
उपस्थित लोगों में उल्‍लेखनीय चर्चित ब्‍लॉगर, अजय कुमार झा, पवन चंदन, सुरेश यादव, पाखी पत्रिका की उप संपादक, प्रतिभा कुशवाहा, संगीता स्‍वरूप, वंदना गुप्‍ता, राजीव तनेजा, शोभना वेलफेयर सोसायटी के सुमित तोमर, विनोद पाराशर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में पीएचडी कर रहे केवल राम, अनिल अत्री इत्‍यादि के नाम उल्‍लेखनीय हैं। मीडियाकर्मियों में ‘इंडिया न्‍यूज़’ के वी के शर्मा, ‘सहारा टीवी’ के रजनीकांत तिवारी, ‘आज तक’ के आनंद कुमार, सतीश शर्मा, संजय राय, राजेश खत्री,  योगेश खत्री, हर्षित, दीपक शरमा, राजेंदर स्वामी ने अपने अपने ब्‍लॉग बनाये।
 
ब्‍लॉग लिखने की तकनीकी जानकारी पद्मावली ब्‍लॉग के पद्म सिंह, ब्‍लॉगप्रहरी के कनिष्‍क कश्‍यप और अविनाश वाचस्‍पति ने सामूहिक रूप से दी। इस कार्यशाला का आयोजन और संचालन अनिल अत्री ने किया। आदर्श नगर में करीब सुबह 11 बजे से शुरू हुई हिन्‍दी ब्‍लॉगिग की यह कार्यशाला शाम 5 बजे तक निरंतर चलती रही। इस कार्यशाला में देश के कई नामी साहित्‍यकार लेखक और दिल्ली के हिंदी पत्रकारों ने भाग लिया।
 Samachar4media.com
 

कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता


कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता दिवस: कुमार सौवीर


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जमीन बदल गयी तो मायने बदल गये। मायने बदले तो चेहरा बदल गया, रहन-सहन और जीवन की शर्तें बदल गयीं। वैश्विक अर्थशास्‍त्र की इस बाढ के चलते खासा बदलाव आ गया है समाज में। तो फिर कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता दिवस। मौजूदा हालातों में तो यह सवाल ही बेमानी हो जाते हैं। अब तो एड्स डे है, वेलंटाइन डे है, वगैरह-वगैरह।
 
इंतजार कीजिए, अभी तो और ना जाने कितने नये नये डे और यह नये आगंतुक डे, हमारे अतीत के सारे दिवसों को सुरसा की तरह निगलते दिखेंगे। नामोनिशान मिट जाएगा इन दिवसों का।
 
मुझे याद है 26 साल पहले का वह दौर, जब मेरे पिता स्‍वर्गीय सियाराम शरण त्रिपाठी जी, पत्रकारिता दिवस और मजदूर दिवस जैसे अवसरों पर बेहद मसरूफ हो जाया करते थे। हफ्तों तैयारियां चलती थीं। नौकरी से अवकाश लेकर वे हर जिलों-कस्‍बों के पत्रकारों को एकजुट किया करते थे। वे लखनऊ में तब के सर्वाधिक शक्तिशाली अखबार स्‍वतंत्र भारत में मुख्‍य उप संपादक थे। उनमें एक दर्शन था, जुझारूपन था, जिसके चलते यूपी के ज्‍यादातर जिलों में उन्‍होंने पत्रकारों का संगठन खडा किया। अब है किसी में वह जज्‍बा। न पत्रकारों में रहा और न ही पत्रकारों की एकता की बात करने वाले संगठनों में। यह तो होना ही था। तब पत्रकार अपनी कलम से पहचाना जाता था, अब पत्रकार क्‍या, संपादक तक इस बात के लिए अपनी तनख्‍वाहें मोटी करवाते घूमते हैं, कि उनकी पहंच फलां नौकरशाह या मंत्री तक है और वे जब चाहेंगे, मालिक का कोई भी काम सेकेंडों में करा देंगे। मालिक भी खुश पत्रकार भी खुश। दसियों लाख रूपये की मोटी तनख्‍याव पाने वालों से आप क्‍या उम्‍मीद करते हैं कि उनमें जनपक्षधरता आ जाए, या वे पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए खुद को बलि चढा दें।
 
अरे अब तो वह दौर आ चुका है कि पैसे के लिए वे अपने ही किसी साथी की बलि बहुत ही संयत भाव से चढा सकते हैं। तो विदा कीजिए हिंदी पत्रकारिता दिवस को। श्रद्धांजलियां दीजिए। और जुट जाइये इस दिवस को मर्सिया पढने के लिए। आमीन।
Sabhar- Samachar4media.com

जयपुर से लॉन्च हुई पत्रिका ‘खिचड़ी


जयपुर से लॉन्च हुई पत्रिका ‘खिचड़ी बातों की’



जयुपर के पत्रकार प्रदीप सिंह, ऋतु रानी मित्रा और प्रदीप सिंह ने एक पत्रिका खिचड़ी बातों की शुरूआत की है। इस मासिक पत्रिका जिसमें हर वर्ग के लिए पठनीय सामग्री उपलब्ध है| पत्रिका में सियासत की भी खबरें होगी साथ ही गांव गलियारो से लेकर संसद तक की जानकारीयां पाठको को दी जायेगीं। पत्रिका की संपादक हैं ऋतु रानी मित्रा जबकि कार्यकारी संपादक की ज़िम्मेदारी प्रदीप सिंह ने संभाली है |   
 
'खिचड़ी बातों की' मैगज़ीन के ज़रिए परिवर्तन की बयार के राजनीतिक वादों के बीच कोशिश होगी एक ठंडी हवा के झोंके को आप तक पहुँचाने की ताकि ऊँचे गुम्बदों की नीचे हमारी आवाज़ उठाने वाले सफेदपोशों तक उस आवाज़ के पीछे छुपा दर्द भी पहुंचाया जा सके| बातों की खिचड़ी इन गलियारों से लेकर प्रशासन के पाषाण कक्षों में पकती है, लेकिन प्रयास होगा कि आप तक भी उसका असली स्वाद पहुंचाया जाए| 
Sabahar-समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो

बी.जे.पी. की श्वासनली अवरूद्ध है


भारत में राजनैति‍क पार्टि‍यां लीडरों के व्‍यक्‍ति‍गत charisma के कारण ही चलती आई हैं. जनता पार्टी, कॉंग्रेस के वि‍रूद्ध जन्‍मी पार्टी थी जो कालांतर में भारतीय जनता पार्टी में रूपांतरि‍त होकर अटल बि‍हारी बाजपेयी के नेतृत्‍व में स्‍थायि‍त्‍व ले पाई. लेकि‍न बाजपेयी की पारी के बाद अडवाणी वहीं से शुरू नहीं कर पाए. 

बहुतायत में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों के इस पार्टी में आने से, इसमें अपेक्षाकृत अनुशासन बना रहता था. कि‍न्‍तु पि‍छले कुछ समय से पार्टी के भीतर नेतृत्‍व के संघर्ष की ख़बरें आती ही रहती हैं. इन ख़बरों का खंडन भी नि‍यम से कि‍या ही जाता रहता है, पर मुश्‍कि‍ल लगता है इस बात पर भरोसा कर पाना कि‍ इस धुएं की बार बार उठने वाली ख़बर सही न हो.

भारतीय जनता पार्टी अब इस समय पहचान की जद्दोजहद से जूझ रही है. अगर 2014 में, कॉंग्रेस के विरूद्ध नकारात्‍मक वोट के कारण यह पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर भी आई तो भी वर्तमान परि‍पेक्ष्‍य में बड़ा मुश्‍कि‍ल लगता है इसका दूर तक चल पाना. इस समय, इसमें सर्वसम्‍मत नेतृत्‍व का अभाव है. येदुरप्‍पा जैसे नेताओं का पार्टी की बात न मानना इसका उदाहरण है. मोदी के वि‍रोध में बहुत से स्‍वर हैं. दूसरे नेताओं का कद इतना दि‍खाई नहीं देता कि‍ वे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍वीकार्य माने जा सकते हों. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का प्रभाव भी इस पार्टी पर आज पहले सा नहीं दि‍खाई नहीं देता कि‍ वही अनुशासन बनाया रखा जा सके.

2014 के चुनावों से पहले, इतने कम समय में कि‍सी ऐसे नेता का उभर कर आना संभव नहीं है जो इस पार्टी को एकजुट दि‍खा सके. पि‍छले लोकसभा चुनाव में भी यही कारण था कि‍ कॉंग्रेस का कोई एक वि‍कल्‍प लोगों को दि‍खाई नहीं दि‍या. इसी के चलते क्षेत्रीय पार्टि‍यों का वि‍स्‍तार भी हो रहा है. क्षेत्रीय पार्टि‍यों का दृष्‍टीकोण भी क्षेत्रीय ही रहता है. क्षेत्रीय पार्टि‍यां केंद्र में रहते हुए भी राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सोचने की अपेक्षा अपने-अपने क्षेत्रों में वोट बैंक पक्‍का करने की जुगत में लगी रहती हैं.

-काजल कुमार
Nukkadh.com

तेल कंपनियों की सरकार है या आम आदमी की ?


-आनंद प्रधान-

ऐसा लगता है कि जैसे यू.पी.ए सरकार पेट्रोल की कीमतों में बढोत्तरी के लिए मौके का इंतज़ार कर रही थी. उसके उतावलेपन का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही संसद का बजट सत्र समाप्त हुआ, उसने सरकारी तेल कंपनियों को कीमतें बढाने का संकेत कर दिया.

दूसरी ओर, सरकारी तेल कम्पनियाँ भी जैसे इसी मौके का इंतज़ार कर रही थीं. उन्हें लगा कि पेट्रोल की कीमतों में बढोत्तरी का मौका पता नहीं फिर कब मिलेगा, इसलिए एक झटके में कीमतों में कोई ६.५० रूपये (टैक्स सहित लगभग ७.५० रूपये) प्रति लीटर की बढोत्तरी कर दी. पेट्रोल की कीमतों में यह अब तक की सबसे बड़ी बढोत्तरी है.

हालाँकि इस बढोत्तरी के लिए सरकार यह कहते हुए बहुत दिनों से माहौल बना रही थी कि बढ़ते आर्थिक संकट को देखते हुए कड़े फैसले करने का वक्त आ गया है. लेकिन यह बढोत्तरी इतनी बे-हिसाब और अतार्किक है कि खुद सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं को भी इसका बचाव करना मुश्किल हो रहा है.

हैरानी की बात नहीं है कि कड़े फैसले की दुहाईयाँ देनेवाले वित्त मंत्री भी यह कहकर इस फैसले से हाथ झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतें वि-नियमित की जा चुकी हैं और उसे सरकार नहीं, बाजार और तेल कम्पनियाँ तय करती हैं. तकनीकी तौर पर यह बात सही होते हुए भी सच यह है कि तेल कम्पनियां सरकार की हरी झंडी के बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ाती हैं.

इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि तेल कंपनियों की मांग और दबाव के बावजूद पिछले छह महीनों से उन्हें पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने की इजाजत नहीं दी गई कारण, पहले उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव थे और उसके तुरंत बाद संसद का बजट सत्र शुरू हो गया, जहाँ सरकार विपक्ष को एकजुट और आक्रामक होने का मौका नहीं देना चाहती थी.

इसीलिए संसद सत्र के समाप्त होने का इंतज़ार किया गया. इस मायने में यह संसद के साथ धोखा है और चोर दरवाजे का इस्तेमाल है. अगर सरकार को यह फैसला इतना जरूरी और तार्किक लगता है तो उसे संसद सत्र के समाप्त होने का इंतज़ार करने के बजाय उसे विश्वास में लेकर यह फैसला करना चाहिए था.

दूसरी बात यह है कि पेट्रोल की कीमतों में इतनी भारी वृद्धि के फैसले का कोई आर्थिक तर्क और औचित्य नहीं है. खासकर एक ऐसे समय में जब महंगाई आसमान छू रही है, इस फैसले के जरिये सरकार ने महंगाई की आग में तेल डालने का काम किया है.

इस तथ्य से सरकार भी वाकिफ है लेकिन उसने आमलोगों के हितों की कीमत पर तेल कंपनियों खासकर निजी तेल कंपनियों और उनके देशी-विदेशी निवेशकों के अधिक से अधिक मुनाफे की गारंटी को ध्यान में रखकर यह फैसला किया है. इस फैसले का एक मकसद डूबते शेयर बाजार को आक्सीजन देना भी है. आश्चर्य नहीं कि इस फैसले के बाद शेयर बाजार में इन तेल कंपनियों के शेयरों की कीमतों में तेजी दिखाई दी है.

मजे की बात यह है कि तेल कम्पनियाँ पेट्रोल की कीमतों में रिकार्ड वृद्धि के बावजूद घाटे का रोना रो रही हैं और पेट्रोल सहित अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में और अधिक वृद्धि की दुहाई दे रही हैं. हैरानी नहीं होगी, अगर अगले कुछ दिनों में सरकार डीजल और रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि का फैसला करे. बाजार का तर्क तो यही कहता है और देशी-विदेशी निवेशक भी यही मांग कर रहे हैं.

साफ़ है कि सरकार कड़े फैसले कंपनियों, शेयर बाजार और निवेशकों को खुश करने के लिए ले रही है. यही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं, मुनाफा हो रहा है. वर्ष २०११ में तीनों सरकारी तेल कंपनियों को भारी मुनाफा हुआ था. इंडियन आयल को ७४४५ करोड़ रूपये, एच.पी.सी.एल को १५३९ करोड़ रूपये और बी.पी.सी.एल को १५४७ करोड़ रूपये का मुनाफा हुआ था.

तेल कंपनियों का यह तर्क भी आधा सच है कि पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि के अलावा कोई उपाय नहीं बचा है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ऊँची बनी हुई हैं और हाल के महीनों में डालर के मुकाबले रूपये की कीमत में खासी गिरावट आने से आयात महंगा हुआ है.

सवाल यह है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ रही है और कीमतें गिरी हैं तब कीमतों में वृद्धि का क्या औचित्य है? दूसरे, क्या रूपये की कीमत में इतनी गिरावट आ गई है कि पेट्रोल की कीमतों में रिकार्डतोड़ बढ़ोत्तरी की जाये?

यही नहीं, सवाल यह भी है कि क्या कीमतों में वृद्धि के अलावा और कोई रास्ता नहीं था? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि सरकार समेत सबको पता है कि पेट्रोल की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी से पहले से ही बेकाबू महंगाई को काबू में करना और मुश्किल हो जाएगा? यह किसी से छुपा नहीं है कि ऊँची मुद्रास्फीति दर का अर्थव्यवस्था पर कितना बुरा असर पड़ रहा है.

आखिर सरकार ने और विकल्पों पर विचार करना जरूरी क्यों नहीं समझा? यह तथ्य है कि पेट्रोल की कीमतों में लगभग आधा केन्द्र और राज्यों के टैक्स का अधिभार है. सच पूछिए तो केन्द्र और राज्य सरकारें पेट्रोल को दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करती हैं. सवाल है कि क्या पेट्रोल पर लगनेवाले टैक्स को कम करने का विकल्प नहीं इस्तेमाल किया जा सकता था?

असल में, सरकार इस फैसले के जरिये देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को यह संकेत देना और उनका विश्वास हासिल करना चाहती है कि वह उनके हितों को आगे बढ़ाने के लिए कड़े फैसले लेने के लिए तैयार है. यह किसी से छुपा नहीं है कि यू.पी.ए सरकार पर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी यह आरोप लगाती रही है कि वह ‘नीतिगत लकवेपन’ का शिकार हो गई है और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी कड़े फैसले करने से बच रही है.

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार कारपोरेट और बड़ी पूंजी के जबरदस्त दबाव में है. आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के एजेंडे के तहत सभी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह विनियमित करने से लेकर सरकारी तेल कंपनियों को निजी क्षेत्र को सौंपना शामिल है.

सच यह है कि यू.पी.ए सरकार इसी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है. पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह विनियमित करने का सबसे ज्यादा फायदा देशी-विदेशी बड़ी निजी तेल कंपनियों को होगा. वे लंबे अरसे से लेवल प्लेईंग फील्ड की मांग कर रही है. यही नहीं, इससे सरकारी तेल कंपनियों के निजीकरण का तर्क भी बनेगा.

लेकिन सवाल यह है कि जब पूरी दुनिया खासकर अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में आम आदमी की कीमत पर निजी तेल कंपनियों के आसमान छूते मुनाफे को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उस समय भारत में तेल कंपनियों के मुनाफे के लिए सरकार आम आदमी के हितों को दांव पर लगाने से नहीं हिचक रही है.

लाख टके का सवाल यह है कि यह आम आदमी की सरकार है या तेल कंपनियों की सरकार?



हार्डकोर वामपंथी छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये आनंद प्रधान का पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण स्थान है. छात्र राजनीति में रहकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में AISA के बैनर तले छात्र संघ अध्यक्ष बनकर इतिहास रचा. आजकल Indian Institute of Mass Communication में Associate Professor . पत्रकारों की एक पूरी पीढी उनसे शिक्षा लेकर पत्रकारिता को जनोन्मुखी बनाने में लगी है.
(साभार--तीसरा रास्ता)

कालेधन को बाज़ार में घुमाने का खेल !


मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

आम आदमी को बलि चढ़ाकर विदेशी निवेशकों की पूजा,राजस्व घाटा महज बहाना
है! कालाधन पर श्वेत पत्र के जरिये सरकार ने भी मान लिया है कि शेयर
बाजार में जो विदेशी निवेश है , वह दरअसल भारत में कमाये काले धन, जो
विदेशी बैंकों में जमा है, उसीको अर्थ व्यवस्था में रीसाइकिल करके सफेद
बनाने का खेल है। अर्थात विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के नजरिये से
नीति निर्धारण दरअसल कालाधन के कारोबारियों के हाथ मजबूत करने की कवायद
ही है। देशवासियों पर पेट्रेल बम बरसाकर भारत का राष्ट्रपति बनने की जुगत
में बाजार का वरदहस्त पाने के मकसद से आम आदमी की बलि चढ़ाकर रोजाना
चंडीपाठ से दिनचर्या शुरू करने वाले वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने विदेशी
निवेश को प्रोत्साहन के बहाने देश के चौतरफा सत्यानाश के लिए कालाधन का
आवाहन ही किया है।यानी वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक की तमाम कलाबाजियों
के बावजूद अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है। जिसके लिए सख्त वित्तीय नीति की
दरकार है। पर सरकार जब कालधऩ के कारोबार की हिफाजत करना ही सर्वोच्च
प्राथमिकता तय कर चुकी है, तब अपराधियों की हिमायत करने के लिए आम आदमी
की बलि चढ़ाने के अलावा विकल्प ही क्या दूसरा बचता है?पिछले साल जुलाई से
लेकर अब तक भारत की मुद्रा डॉलर के मुकाबले 27 प्रतिशत गिरी है।भारत
निर्यात के मुकाबले आयात अधिक करता है, इसकी वजह से व्यापार में काफी
असंतुलन होता है जिसे व्यापार घाटा भी कहते हैं।मार्च 2012 में समाप्त
होने वाले वित्त वर्ष में यह घाटा बढ़ कर 185 अरब डॉलर पहुंच गया जबकि
इसका अनुमान 160 अरब डॉलर का था।जानकारी मिली है कि भारतीय कंपनियों के
विदेशी निवेश के लिए आरबीआई ने नियम सख्त बनाने का प्रस्ताव रखा
है।आरबीआई चाहता है कि अप्रूवल रूट के तहत किए जा रहे प्रत्यक्ष विदेशी
निवेश के लिए मल्टीलेयर्ड बिजनेस स्ट्रक्चर बनाए जाएं। फिलहाल अप्रूवल
रूट के तहत एसपीवी के जरिए ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया जा सकता
है।टैक्स संधि का बेजा फायदा उठाए जाने पर रोक लगाने के लिए आरबीआई
नियमों में बदलाव चाहता है। आरबीआई के प्रस्तावों को फॉरेन एक्सचेंज
मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) गाइडलाइंस में शामिल किया जा सकता है। आप डीजल के
लिए भी ज्यादा पैसे देने के लिए तैयार हो जाइए क्योंकि अगले महीने ये भी
महंगा हो सकता है। हालांकि, पेट्रोल की तरह डीजल में अचानक 5-7 रुपये की
बढ़ोतरी नहीं की जाएगी लेकिन इसे किस्तों में महंगा किया जा सकता है।

मालूम हो कि राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव की उम्मीदवारी खारिज करते हुए
ममता दीदी ने उन्हे बंगाल का भूमिपुत्र मानने से इंकार करते हुए उन्हें
विश्व पुत्र कहा है। क्या इसका मायने यह है कि वैस्विक खुले बाजार की
व्यवस्था के पुत्र हैं प्रमव दादा, इस पर शोध की जरुरत है। बहरहाल
पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमत वापस लेने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने
के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस शनिवार को कोलकाता में रैली निकालेगी,
जिसका नेतृत्व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व पार्टी की अध्यक्ष ममता
बनर्जी करेंगी। तृणमूल सूत्रों के अनुसार, ममता शनिवार को शाम करीब पांच
बजे जादवपुर से हाजरा क्रॉसिंग तक सात किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर अपना
विरोध जताएंगी। उनके साथ पार्टी के अन्य कार्यकर्ता व सदस्य भी
होंगे।केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की एक प्रमुख
घटक तृणमूल ने गुरुवार को भी मूल्य वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन किया था,
जिसका नेतृत्व रेल मंत्री मुकुल रॉय ने किया था।

ममता या सत्ता गठबंधन के पक्ष विपक्ष के नेताओं की राजनीति से हालांकि आम
आदमी के धड़ में प्राण फूंके जाने के आसार नहीं है। बल्कि मरे हुओं पर
फिर प्रहार की पूरी तैयारी है। सूत्रों के मुताबिक सरकार जून में डीजल के
दाम बढ़ाने पर फैसला ले सकती है। दाम कब बढ़ाने हैं ये रुपया, बाजार और
राजनीतिक हालत को देखकर तय किया जाएगा। अगर रुपये का भाव 54 प्रति डॉलर
रहा तो मौजूदा वित्त वर्ष में डीजल पर 1,10,000 करोड़ रुपये के घाटे का
अनुमान है।और अगर यही रुपया थोड़ा मजबूत होकर 50 प्रति डॉलर तक आया तो ये
घाटा घटकर 85,000 करोड़ रुपये हो सकता है। इस साल पेट्रोलियम सब्सिडी में
जो पैसे दिए जाने हैं उनसे पहले ही बीते वित्त वर्ष के घाटे की भरपाई की
जा चुकी है।डॉलर के मुकाबले रुपया जिस तरह से कमजोर होता जा रहा है, उससे
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा होने लगा है। हो सकता है कि
हमारा आयात-निर्यात संतुलन चरमरा जाए। ऊपर से पेट्रोल के दाम में रिकॉर्ड
वृद्धि हुई है। जाहिर है, एक तरफ अर्थव्यवस्था को करारा झटका लग रहा है,
दूसरी तरफ आम लोगों पर महंगाई की एक और मार पड़ने वाली है।प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह ने विश्वास जताया कि देश की अर्थव्यवस्था मौजूदा कठिनाईयों
को पार कर ले जाएगी और भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछड़ने की बात करने वाले
गलत साबित होंगे। सिंह ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे
कार्यकाल के तीन वर्ष की प्रगति रिपोर्ट की भूमिका में कहा कि विश्व
अर्थव्यवस्था के मुश्किल रहे इस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था ने पूरी
कुशलता से काम किया है।संप्रग के 22 मई 2009 को दोबारा सत्ता में आने के
बाद अब तक तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह किसी भी सत्ताधारी गठजोड़ के
लिए महत्त्वपूर्ण है लेकिन इस सरकार की नीतिगत निष्क्रियता के बीच यह
बेमानी हो चला है। यह निष्क्रियता संप्रग-2 के कार्यकाल के अधिकांश
हिस्से में हावी रही है और इसकी बदौलत देश की अर्थव्यवस्था संकटपूर्ण
स्थिति में पहुंच गई है।

लोकसभा के पटल पर रखे गए श्वेतपत्र में बताया गया है कि स्विस बैंकों में
जमा काले धन में बीते सालों में कमी आई है। 2006 के 23,373 करोड़ रुपए से
कम होकर 2010 में यह 9295 रह गया। इसमें सबसे कम धन भारतीयों का ही है,
ऐसा रिपोर्ट में बताया गया है। साथ ही काले धन से निबटने के लिए सरकार की
ओर से 5 सूत्रीय रणनीति बनाई गई है। इसके साथ ही श्वेतपत्र में आम माफी
की जरूरत से भी इंकार किया गया है।श्वेतपत्र में काले धन के बारे में कोई
ठोस आंकड़ा नहीं दिया गया है और न ही काले धन से संबंधित नामों का जिक्र
किया गया है। हालंकि सीबीडीटी की जांच पर श्वेतपत्र तैयार है। बताया गया
है कि श्वेतपत्र के बाद काले धन पर एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट अगस्त माह
तक आएगी।विदेशों में पड़े कालेधन की मात्रा का पता लगाने के लिए सरकार ने
एक अध्ययन शुरू किया है, जो सितम्बर तक पूरा हो जाने की सम्भावना है।यह
अध्ययन तीन अलग-अलग सरकारी संस्थाएं- द नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक
फाइनेंस एंड पॉलिसी, द नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंशियल मैनेजमेंट और
नेशल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च कर रही हैं।संसद के भीतर
विपक्ष ने काले धन को लेकर सरकार को कई बार घेरा है। योग गुरु बाबा
रामदेव ने भी काले धन को लेकर अभियान चलाया हुआ है।

विडंबना देखिये कि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पन्द्रह सबसे बड़ी
अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। १९९१ से भारत में बहुत तेज आर्थिक प्रगति
हुई है जब से उदारीकरण और आर्थिक सुधार की नीति लागू की गयी है और भारत
विश्व की एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में उभरकर आया है। लेकिन भारत की
अर्थव्यवस्था पर विदेशी निवेशकों का भरोसा कम होता जा रहा है। सीएलएसए,
मॉर्गन स्टैनली के बाद बैंक ऑफ अमेरिका मैरिल लिंच और गोल्डमैन सैक्स ने
भी वित्त वर्ष 2013 का जीडीपी अनुमान घटाया है।बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल
लिंच ने वित्त वर्ष 2013 के लिए अनुमानित जीडीपी दर 6.8 फीसदी से घटाकर
6.5 फीसदी की है। बैंक का कहना है कि ग्रीस के यूरोपियन यूनियन से बाहर
होने पर भारत की जीडीपी घटकर 5.5 फीसदी हो सकती है।वहीं, घटते निवेश और
सरकारी नीतियों में अनिश्चितता की वजह से गोल्डमैन सैक्स ने देश का
जीडीपी का अनुमान 7.2 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी किया है।मॉर्गन स्टैनली
जीडीपी का अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.3 फीसदी और सीएलएसए 6.7 फीसदी से
घटाकर 6.3 फीसदी कर चुके हैं। जीडीपी अनुमान घटाने की वजह बढ़ती महंगाई
और घटता निवेश है।सीएलएसए के राजीव मलिक का कहना है कि वित्त वर्ष 2013
में भारत में अच्छी ग्रोथ की उम्मीद नहीं है। बेकाबू महंगाई आरबीआई के
लिए सिरदर्द बनी रहेगी। देश का विदेशी पूंजी भंडार 18 मई को समाप्त
सप्ताह में 1.8 अरब डॉलर घटकर 290 अरब डॉलर दर्ज किया गया। यह लगातार
तीसरे सप्ताह की गिरावट है। पिछले दो सप्ताहों में विदेशी पूंजी भंडार
में क्रमश: 1.37 अरब डॉलर और 2.18 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई
है।भारतीय रिजर्व बैंक के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पूंजी
भंडार का सबसे बड़ा घटक विदेशी मुद्रा भंडार इसी अवधि में 1.74 अरब डॉलर
घटकर 256.11 अरब डॉलर रह गया। रिजर्व बैंक के मुताबिक विदेशी मुद्रा
भंडार को डॉलर में अभिव्यक्त किया जाता है और गैर डॉलर मुद्राओं के
मुल्यों में उतार चढ़ाव का इस पर असर पड़ता है। हालांकि माना जाता है कि
रुपये का अवमूल्यन रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने भंडार से डॉलर की
बिक्री की है। इस सप्ताह रुपये ने डॉलर के मुकाबले 56.40 का रिकार्ड
निचला स्तर छुआ। लगातार आठवें सप्ताह रुपये में गिरावट दर्ज की गई है।
विशेष निकासी अधिकार का मूल्य इस अवधि में 3.55 करोड़ डॉलर घटकर 4.39 अरब
डॉलर रहा, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में देश का भंडार 2.36 करोड़
डॉलर घटकर 2.86 अरब डॉलर दर्ज किया गया। स्वर्ण भंडार का मूल्य हालांकि
26.61 अरब डॉलर पर स्थिर रहा।हालांकि भारत एक आकर्षक ठिकाना बन गया है जो
विदेशी निवेश और अप्रवासी भारतीयों का पैसा खींच सकता है, यह व्यापार
घाटे को पूरा करने के लिए काफी नहीं है।साल 2011-12 में भारत में स्टॉक
और बॉंड में आए 18 अरब डॉलर के अलावा 30 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया
था।

कारपोरेट इंडिया की दलील है कि जो कारपोरेट लाबिइंग बन कर पेट्रोल बम
बरसाती है। भारत के आर्थिक सुधारों के प्रति वचनबद्धता को लेकर
अनिश्चितिता, बीते समय से लगाए जाने वाले कर और सरकारी नीतियों में
गतिहीनता ने विदेशियों को यहां निवेश करने के फैसले स्थगित करने या
भारतीय स्टॉक बाजार से पैसे निकालने के लिए मजबूर कर दिया है।बाजार
विश्लेषकों का कहना है कि कमजोर होता रुपया उन विदेशी निवेशकों का रिटर्न
कम कर रहा है, जिन्होंने डॉलर में निवेश किया है। इंड्सइंड बैंक के
इकोनामिक एंड मार्केट रिसर्च के प्रमुख मॉसेस हार्डिंग का कहना है कि
विदेशों में डॉलर के मजबूत होने घरेलू स्तर पर बैंकों और आयातकों की ओर
से डॉलर की मांग की जा रही है। इसका असर रुपये के भाव पर पड़ रहा है।
यानी, डॉलर के मुकाबले उसमें अवमूल्यन हो रहा है।जून 2011 में सरकार ने
तेल विपणन कंपनियों को यह स्वतंत्रता प्रदान की थी कि वे अंतरराष्ट्रीय
बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक पेट्रोल कीमतों का समायोजन कर
सकें। डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में भी इजाफा किया गया था, हालांकि
उन्हें नियंत्रण मुक्त नहीं किया गया था। हालांकि इन उत्पादों को
नियंत्रणमुक्त किए जाने की कई सिफारिशें नहीं माने जाने के कारण सरकार को
लेकर निराशा तो थी लेकिन पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने के
फैसले ने थोड़ी राहत भी दी थी।समूचे टालमटोल ने देश की अर्थव्यवस्था को
दोहरे घाटे की ओर धकेल दिया है। बढ़ता राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा
वर्ष 1991 के आर्थिक संकट की याद दिला रहे हैं। संप्रग सरकार में ऊंचे
पदों पर आसीन नौकरशाह अब उम्मीद कर रहे हैं कि राजनीतिक नेतृत्व अब तो
जरूरी कदम उठाएगा। उन्हें यह आश्चर्य भी है कि आखिर क्यों सरकार वस्तु
एवं सेवा कर जैसे कर सुधार के मुद्दे पर इच्छुक राज्यों के
मुख्यमंत्रियों के साथ चर्चा कर आगे नहीं बढ़ रही है। अगर इन राज्यों में
नई व्यवस्था लागू हो जाती है तो बाकी राज्यों को उसका अनुसरण करना चाहिए।
राज्य मूल्य वर्धित कर के मामले में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ था।रुपये के
मूल्य में गिरावट और मुद्रस्फीति के दबाव बीच वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी
ने बुधवार को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अंदर से मजबूत है ऐसी चुनौतियों
से निपटने में सक्षम है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार महंगाई पर काबू
तथा चालू खाते के घाटे (सीएडी) को कम करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा, ''मुझे भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने की
क्षमता पर पूरा भरोसा है। पूर्व में हम जिस तरह सफलतापूर्वक आर्थिक
चुनौतियों से बाहर निकले हैं, इस बार भी ऐसा करने में सफल रहेंगे।'

खनन मंत्रालय हिंदुस्तान जिंक और बाल्को के बाकी हिस्से को बेचने की
तैयारी में जुटने वाला है। मामले पर सचिवों की समिति की राय कैबिनेट सचिव
को भेजी जाएगी।

हिंदुस्तान जिंक और बाल्को का बाकी हिस्सा बेचने के लिए खनन मंत्रालय
ईजीओएम से सलाह लेगा। वित्त मंत्रालय जल्द ईजीओएम की बैठक की तारीख तय
करने वाला है।

सचिवों की समिति में हिंदुस्तान जिंक और बाल्को का बाकी हिस्सा बेचने पर
अंतिम फैसला नहीं लिया जा सका था। समिति का मानना था कि हिस्से के लिए
प्रस्तावित रकम कम थी।

वेदांता रिसोर्सेज ने हिंदुस्तान जिंक और बाल्को के बाकी हिस्से के लिए
17274 करोड़ रुपये चुकाने का प्रस्ताव रखा था।

आपराधिक नीति निर्धारण पर बटमारो की नजर है। रुपये की लड़ाई लड़ रहे रिजर्व
बैंक को एक और चुनौती से रूबरू होना पड़ा। इंटरनेट के डकैतों ने आरबीआई की
वेबसाइट को अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि सरकारी वेबसाइट को हैक करने
का ये अकेला मामला नहीं है कुछ दिन पहले ही कई और वेबाइसाइट को शिकार
बनाया जा चुका है।

आरबीआई की वेबसाइट ऐसी पहली वेबसाइट नहीं थी, जिसे हैक किया गया हो। इससे
पहले भी कई अहम वेबसाइटों को हैकरों ने अपना निशाना बनाया है। पिछले
हफ्ते ही सुप्रीम कोर्ट और कांग्रेस पार्टी की वेबसाइट को हैक कर लिया
गया था जिसे हैकरों ने 3 घंटे बाद अपने आप ही छोड़ दिया। अब सवाल ये उठता
है कि सरकारी वेबसाइटों को कुछ देर तक के लिये हैक करने के पीछे हैकरों
का मकसद क्या होता है? इस बार हैकरों ने भारतीय इंटरनेट पर कुछ वीडियो
शेयरिंग साइटों पर लगे पाबंदी के चलते सरकारी साइटों को हैक किया।

क्या भारतीय सरकार की वेबसाइटों को हैक करना इतना आसान होता है। देखिये
कुछ तो हैकर काफी प्रशिक्षित हो गये है, दूसरा भारतीय सरकार अभी भी कुछ
मामलों में अपनी ऑनलाइन सिक्योरिटी को ज्यादा तवज्जो नहीं देती। जिसके
कारण हैकरों के लिए हैकिंग करना और भी आसान हो जाता है।

खैर इस बार हैकिंग तो हैक्टिविजिम की मिसाल थी जिसका मुख्य उद्देश्य
सरकार और मीडिया का ध्यान अपनी और खींचना था। पर सोचिये, अगर आरबीआई पर
हुआ ये हैकिंग हमला जरूरी जानकारियों या पैसे चुराना होता, तो कितना
नुकसान होता ये हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। तो सरकार के लिए अब जागने का
और अपने सिस्टम को हैकिंग प्रूफ बनाने का वक्त आ गया है।

कहीं अनुपमा के कांधे पर बंदूक रखकर तो नहीं चला रहे कुछ लोग?


इस थ्रिल-स्‍टोरी के केंद्र में है एक अकेली महिला अनुपमा सिंह, जबकि उसके चारों कोनों पर लपलपाते खड़े हैं नेता, ठेकेदार, गुंडे और बेलगाम आला अफसर। बसपा सरकार में अनुपमा की जमकर छीछालेदर हो चुकी है। इन्‍हीं चौगड़ी के चलते ही अनुपमा को नौकरी से निकाला गया, पति का दो बार हृदयाघात हुआ, बेटे पर जानलेवा हमला किया गया। लेकिन हौसलामंद अनुपमा ने अपनी लड़ाई जारी रखी।
बहरहाल, अब सपा सरकार में उसकी सुनवाई हुई और तब प्रदेश में नौकरशाही के सर्वोच्‍च रहे कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और मायावती के सचिव रहे नवनीत सहगल समेत विधायक व शिक्षक माफिया के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में आपराधिक मामलों में मुकदमा दर्ज कर दिया गया है। दूसरी ओर शशांक शेखर सिंह और नवनीत सहगल ने एक ईमेल जारी कर अनुपमा के आरोप को सिरे से नकारते हुए उसे साजिश बताया है और कहा है कि अनुपमा की यह करतूत हाईकोर्ट की मानहानि है। ईमेल में दावा किया गया है कि यह अफसर इस मामले में न्‍यायालय की शरण में जाएंगे। वैसे इस मामले में अनुपमा सिंह कई अनसुलझे सवालों के चलते खुद ही संदेहों के घेरों में फंस दिखती हैं।
कांड की शुरुआत बसपा सरकार के दौरान हुई। मायावती के ड्रीम-प्रोजेक्‍ट ताज कॉरीडोर के घोटालों के खिलाफ अनुपमा सिंह ने जनहित याचिका लखनऊ हाईकोर्ट में दाखिल की थी। याचिका में मायावती और उनके करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी की करतूतों की जांचने की मांग की गयी थी। यह याचिका तब दायर हुई जब राज्‍यपाल ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग खारिज कर दी थी। अनुपमा गोमतीनगर के विश्‍वास खंड में रहती हैं। अनुपमा एक निजी कालेज में काम करने के साथ ही दुर्गा देवी सर्वजन सेवा संस्‍था की अध्‍यक्ष भी हैं।
अनुपमा सिंह के अनुसार इस मामले में जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री मायावती व पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन को नोटिस जारी की गई, बसपा सरकार के इशारे पर सरकार के बिल्‍लौरी-आंख कहे जाने वाले अधिकारियों ने उनका उत्पीड़न शुरू कर दिया। एक निजी कालेज में नौकरी कर रही अनुपमा को नौकरी से निकाल दिया गया। उनका आरोप है कि पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर व वरिष्ठ आईएएस नवनीत सहगल ने उन्हें इसके लिए दबाव बनाया था। पति अनुज की अमीनाबाद स्थित दवा की दुकान को तबाह करने की भी साजिश की गयी। अनुज को दो बार दिल का दौरा पड़ा। कालेज से हटने के बाद अनुपमा एमिटी यूनीवर्सिटी में लाइब्रेरियन गयीं लेकिन उसके बाद भी उनका प्रताड़ना जारी रहा। एमिटी के संस्थापक अशोक चौहान ने उनकी नौकरी छीन ली। पैरवी से हटाने के लिए वकील पर भी दबाव बनाया गया।
उधर भाजपा के रास्‍ते सपा और फिर बसपा की डगर तक विधायकी हासिल करने वाले गोंडा से बसपा के नेता व पूर्व विधायक अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भैय्या व उनके साथियों ने उन्हें जान से मारने और बेटे को अगवा कराने की धमकी दी। दो बार उनके बेटे पर जानवाला हमला किया गया। यही नहीं, एक दिन लल्ला भैय्या अपने साथियों के साथ घर पहुंच कर याचिका वापस लेने धमकी दे गये। लखनऊ में अपर पुलिस अधीक्षक पूर्वी का दावा है कि अनुपमा की तहरीर पर हजरतगंज कोतवाली में आईपीसी की धारा 143 (तीन से अधिक लोगों द्वारा प्रताड़ित करना), 506 (धमकी देना), 507 (टेलीफोन पर धमकी देना) व 452 (घर में आकर धमकाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। हजरतगंज कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद अब मामले की विवेचना गोमतीनगर पुलिस को सौंपी गयी है।
बसपा सरकार में लोगों की प्रताड़ना का किस्‍सा सैकड़ों नहीं, हजारों-लाखों में पसरा हुआ है। बसपा सरकार की ब्‍यूरोक्रेसी की करतूत की धज्जियां तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव तक उड़ा चुके हैं। ऐसे ही एक बड़े मामले में पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती के कार्यालय के पास के एक एमएलसी के मकान को जबरिया कब्‍जे ने की साजिश की थी। घटना के अनुसार इस एमएलसी से मायावती के एक प्रमुख सचिव शैलेष कृष्‍ण ने उस मकान को खाली करने का मौखिक आदेश किया था। दरअसल, एमएलसी के इस मकान को खाली कराने के लिए उसे मायावती के प्रेरणास्‍थल में शामिल करने की साजिश थी। लेकिन फोन पर हुई इस बातचीत को उस नेता ने फोन टेप करने मुलायम सिह यादव के सामने पेश कर दिया। पलटवार कर मुलायम सिंह यादव ने आनन-फानन एक प्रेस-कांफ्रेस आयोजित इस साजिश का भांडाफोड कर दिया था।
लेकिन अनुपमा के इस कांड में कई पेंच भी शामिल हैं जो अनुपमा सिंह को संदेहों के कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। सवाल है कि समाजसेवा और कालेज में लाइब्रेरियन का काम कर रही अनुपमा का आखिर ताज कारीडोर से क्‍या संपर्क रहा। सवाल यह भी है कि पिछले तीन बरसों के बीच इस अनुपमा ने अपने साथ हुए कथित अन्‍याय पर क्‍या प्रतिवाद किया। आखिर वह मजबूरी क्‍या थी जब अपने पुराने वकील चंद्रभूषण पांडेय को उन्‍होंने पैरवी से मना कर दिया। सूत्र तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि यह कांड कुछ लोग अनुपमा के कांधे पर बंदूक रख कर चला रहे थे।
लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर यूपी के जाने माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्तान, महुआ, एसटीवी समेत कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. सौवीर अपने बेबाक बयानों और दमदार लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है
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